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Ear Problem Solution

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Ear Infection

कान शरीर के सबसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील अंगों में से एक हैं। शरीर का यह एक ऐसा हिस्सा है जिसका ध्यान इंसान सबसे कम रखता है। कान में संक्रमण अकसर बैक्टीरियल या वायरल संक्रमण (Bacterial Viral Infection) के कारण होता है जो कि मध्य कान को प्रभावित करता है  जिसमें छोटी हड्डियों की पहाड़ी बनी होती है। इसी में कान के परदे के पीछे हवा से भरी जगह होती है।
बड़ों की तुलना में बच्चों में कान का संक्रमण तेजी से होता है क्योंकि बच्चों के कानों की सफाई बेहद कम होती है। बच्चों के कान अधिक संवेदनशील और ज्यादा जल्दी गंदे हो जाते हैं। संक्रमण होने पर कान तो अपना कार्य शांतिपूर्वक करते रहते हैं लेकिन जब इनमें पीड़ा होती है तो वह भी असहनीय होती है।

कान को तीन भागों बाहरी कान, मध्य कान और भीतरी कान में बांटा गया है। संक्रमण कान के किसी भी हिस्से में हो सकता है। मुख्य तौर पर होने वाले तीन संक्रमण निम्न हैं: ​

1. बाहरी कान में संक्रमण (external ear infection)
- बाहरी कान का संक्रमण आमतौर पर बाहरी कान तक ही सीमित होता है और यह बैक्टीरियल या फंगल के कारण होता है। बाहरी कान में संक्रमण के कुछ आम कारण हैं:


वैक्स संचय (Wax Accumulation): कान में कुछ वैक्स प्राकृतिक रूप से होती है लेकिन समय के साथ यदि यही वैक्स बढ़ती जाए तो बैक्टीरिया और कवक के बढ़ने का स्थान बन जाती है, जहां आसानी से बैक्टीरिया बढ़ने लगते है, इस स्थिति को ग्रेन्युलोमा कहते हैं। ऐसे में कान में दर्द होता है और कान से पानी निकलने लगता है।


ओटिटिस एक्सटर्ना (Otitice externa)- बाहरी कान का यह संक्रमण ज्यादातर तैराकों में होता है। कान में किसी प्रकार के द्रव्य जैसे पानी आदि चले जाने पर ओटिटिस एक्सटर्ना होता है। कान के अंदर पहले से ही मौजूद बैक्टीरिया को यह द्रव और भी सकारात्मक वातावरण देते हैं। कान के अंदर तरल प्रदार्थ चले जाने से कान की वैक्स फूलने लगती है जिससे संक्रमण होता है।

2.मध्य कान में संक्रमण (Middle Ear Infection)- यह संक्रमण भी ओटिटिस माध्यम से आता है जो ज्यादातर नाक या गले में सर्दी, जुकाम और खांसी के कारण होता है। गले और नाक में होने वाली एलर्जी कान को भी प्रभावित करती है। इस दौरान गले और नाक के बैक्टीरिया मध्य कान में पहुंच सकते हैं और संक्रमण पैदा कर सकते हैं। दूध पीने वाले बच्चों में कान का संक्रण तेजी से होता है क्योंकि दूध कई बार मुंह से निकलकर कान की ओर बह जाता है। मध्य कान में संक्रमण भी दो प्रकार के होते हैं, जो निम्न हैं:

एक्यूट या तेज मध्य कान संक्रमण (Acute Middle Ear Infection)- इसमें आमतौर पर तीव्र दर्द, जलन और बुखार हो सकता है। यह संक्रमण छोटी अवधि का होता है जो कि थोड़ी देखभाल के बाद ठीक हो जाता है।


जीर्ण या क्रोनिक मध्य कान में संक्रमण (Chronic Middle Ear Infection)- यह संक्रमण हफ्तों या महीनों के लिए किसी भी व्यक्ति को परेशान कर सकता है। कान के इस संक्रमण को कान के दर्द, कान से किसी भी तरह के रिसाव और चिड़चिड़ेपन से पहचाना जा सकता है। यह भी तीन प्रकार का होता है-
क) इस्टेशियन ट्यूब में द्रव भरा रहता है।
ख) कान के पर्दों में छेद
ग) कान हड्डियों में कटाव
 
3. आंतरिक कान संक्रमण (Internal Ear Infection)- आंतरिक कान संक्रमण अमूमन ज्यादा लोगों को नहीं होता। यह कभी-कभी वायरल के दौरान हो सकता है जिसमें रक्त के माध्यम से बैक्टीरिया कान में प्रवेश कर जाते हैं जो कि कई बार सिर में चक्कर आने का कारण बन जाते हैं। यदि इस इंफेक्शन को लंबे समय तक अनदेखा किया जाए तो कान की सुनने की शक्ति खत्म हो सकती है।


कान का संक्रमण बैक्टीरिया और वायरस के कारण होता है। इसके कारण, ऊपरी श्वसन में संक्रमण से सूजन या यूस्टेशीयून ट्यूब ब्लॉक हो जाती है, जो कि कान से गले के बीच जुड़ी होती है। ऐसे में हवा मध्य कान तक नहीं पहुंच पाती। यह एक वैक्यूम और सक्शन का निर्माण करता है, जो नाक और कान के मध्य भाग से तरल पदार्थ और कीटाणुओं को खींचता है। ऐसे में सूजी हुई ट्यूब ड्रेनिंग से इस द्रव को रोकता है। कान में संक्रमण को फ़ैलाने और विकसित करने के लिए तरल पदार्थ, बैक्टीरिया और वायरस अहम भूमिका निभाते हैं।

बैक्टीरियल इन्फेक्शन (Bacterial infections)- बैक्टीरिया कान में संक्रमण का सबसे बड़ा कारण होता है। जिनमें, स्ट्रैपटोकोकस निमोनिया (पनेउमोकॉकस, हेमोफिलस इन्फ्लुएंजा, और मोरक्सेला कटरहालीस) सबसे आम है।


वायरल इन्फेक्शन (Viral infections)- वायरस भी कान के संक्रमण के कारण बन सकते हैं। जिसमें श्वसन सैंसीटीएल वायरस (आरएसवी) और फ्लू (इन्फ्लूएंजा) वायरस सबसे आम है।
बिना संक्रमण के भी कान में, सूजन और तरल पदार्थ पैदा का निर्माण हो सकता है, और यही वजह है कि कानों में दर्द होता है, इसे ओटिटिस मीडिया विद इफ्यूजन के रूप में जाना जाता है।

मध्य कान में संक्रमण (तीव्र ओटिटिस मीडिया) के लक्षण अक्सर सर्दी या अन्य ऊपरी श्वसन संक्रमण की शुरुआत के 2 से 7 दिनों के बाद होता है। कान में संक्रमण के लक्षणों में शामिल हो सकते हैं-

कानों में दर्द-
कानों में दर्द संक्रमण के आम लक्षण हैं। जो गंभीर और हल्के रूप में हो सकते हैं। खासकर जब बच्चों को दर्द होता है, तो वह अपने कानों को खींचते या खुजलाते हैं।


बुखार- बुखार भी कानों के संक्रमण का एक लक्षण है।


कानों में ड्रेनेज- कानों में मोटे,पीले या खून के रूप में ड्रेनेज की समस्या दिखाई देती है। इसका मतलब यह होता है कि शायद कान के पर्दे फट गए हों। लेकिन यह छेद हफ्ते भर में खुद-ब-खुद भर जाते हैं।


भूख की कमी- भूख, उल्टी, और गुस्सा या व्यवहार में बदलाव जैसी चीज़ें देखने को मिलती हैं।
नींद की समस्या- कानों में संक्रमण के दौरान, नींद न आने जैसी भी समस्या उत्पन्न हो जाती है।
कान में, तरल पदार्थों के बनने के लक्षण कुछ इस तरह से हो सकते हैं-

पॉपिंग, रिंगिंग या कानों में दवाब के साथ भारीपन जैसा महसूस होना। साथ ही अगर बच्चा छोटा हो, तो वह अपनी इस परेशानी को बता भी नहीं पाता। वह इस दबाव से राहत पाने के लिए अपने कानों को रगड़ते रहतें हैं।
सुनने की समस्या उत्पन्न हो जाती है, जिससे कि बच्चों को सुनने में कठिनाई होती है।
इसके साथ ही चक्कर आने, जैसी समस्या भी देखने को मिलती हैं।

कान के संक्रमण से बचने के लिए सबसे जरूरी है साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखना। इसके अतिरिक्त कुछ निम्न बातें पर अमल कर भी कानों के संक्रमण से बचा जा सकता है।


वैक्स की सफाई (Cleaning of the wax)- कान में अतिरिक्त वैक्स कान में बैक्टीरिया को बढ़ाकर, कान में संक्रमण पैदा करती है। कान की वैक्स को चिकित्सकों द्वारा सूक्ष्म उपकरणों से साफ कराया जा सकता है। अमूमन लोग ईयर बड से भी कान की सफाई कर लेते हैं लेकिन यदि वेक्स ज्यादा है तो उसे ईयर बड से साफ नहीं किया जा सकता।


इयर ड्रॉप्स का प्रयोग (Use of Ear Drops)- कई दफा कान की दवा डालने से भी कान के संक्रमण से निजात मिल जाती है। चिकित्सक कान दर्द के लिए इयर ड्रॉप देते हैं जिससे कान के दर्द के साथ ही वैक्स भी निकल जाती है।


टिप्स- (Tips to Prevent Ear Infection)
- सर्दी जुकाम में अच्छी तरह से हाथ धोने के बाद ही खाना-पीना खाएं।
- सर्दी जुकाम में बाहर जाने से बचें। भीड़ वाली जगहों पर संक्रमण का खतरा ज्यादा होता है।
- धूम्रपान से बचें।
- बच्चों में टीकाकरण समय से करवाएं। उन्हें न्यूमोकोकल टीके जरूर लगवाएं।

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